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कन्याकुमारी मंदिर

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कन्याकुमारी  शहर भारत के तमिलनाडु राज्य के कन्याकुमारी ज़िले में स्थित एक नगर है। यह  मुख्यभूमि का दक्षिणतम नगर है। यहाँ से दक्षिण में हिन्द महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और पश्चिम में अरब सागर है। इनके साथ सटा हुआ समुद्र तट 71.5 किमी लंबा है।कन्याकुमारी दक्षिण भारत के महान शासकों चोल, चेर, पांड्य के अधीन रहा है। मंदिर को आठवीं शताब्दी में पंड्या सम्राटों द्वारा स्थापित किया गया था और बाद में इसे विजयनगर, चोल और नायक राजाओं द्वारा पुनर्निर्मित किया गया।इसलिए यहां के भवनों तथा  स्मारकों पर इनकी स्पष्ट छाप दिखाई देती है।कन्याकुमारी तीन सागरों का संगम स्थल है। विभिन्न सागरों के मिलन का अद्भुत नज़ारा यह देखने को प्राप्त होता है। ये भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगो से मनोरम छटा बिखेरते हैं।कन्याकुमारी वर्षो से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। दूर-दूर फैले समुद्र के विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र किनारे फैले रंग बिरंगी रेत इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं।

समुद्र तट के किनारे स्थित कन्या कुमारी का मन्दिर दुनिया के पवित्रतम मन्दिरों में से एक है।कुमारी अम्मन मन्दिर108 शक्तिपीठों में से एक है।यह मन्दिर कुमारी अम्मन मन्दिर या कन्याकुमारी मन्दिर के नाम से  प्रसिद्ध है।मन्दिर देवी कन्या कुमारी का घर भी माना जाता है।देवी कन्या कुमारी एक किशोर कन्या के रूप में देवी श्री भगवती हैं। देवी को श्री बाला भद्र या श्री बाला के नाम से भी जाना जाता है। वह लोकप्रिय रूप से शक्ति” (दुर्गा या पार्वती) देवी के रूप में जानी जाती हैं। 3000 साल से भी ज्यादा पुराने कुमारी अम्मन मन्दिर का केवल धार्मिक बल्कि ऐतिहासिक महत्व भी है।कन्याकुमारी मन्दिर के इतिहास का कई प्राचीन शास्त्रों में उल्लेख प्राप्त होता है।हिन्दू महाकाव्य महाभारत और रामायण में भी कुमारी अम्मन मन्दिर का  विवरण है। मणिमक्कलई और पूरनानूरु जैसे संगम कार्यों में भी इस मन्दिर का उल्लेख है। त्रावणकोर साम्राज्य का एक हिस्सा यह  भव्य प्राचीन  मन्दिर समुद्र के किनारे स्थित है।

यह मन्दिर प्रचलित कहानियों में भगवान शिव से विवाह करने के लिए आत्मदाह करने वाली कुंवारी देवी पार्वती के अवतार के लिए भी जाना जाता है। शक्तिपीठों में से एक कन्याकुमारी के बारे में पौराणिक ग्रंथों में विवरण है कि एक बार बाणासुर ने घोर तपस्या कर भगवान शंकर को प्रसन्न कर लिया। वरदान स्वरूप उसने भगवान शंकर जी से अमरत्व का वरदान माँगा। भगवान शंकर जी ने वरदान देते हुए कहा कि कन्याकुमारी के अतिरिक्त तुम सभी से अजेय रहोगे। वरदान पाकर बाणासुर ने त्रिलोक में घोर उत्पात मचाना प्रारम्भ कर दिया। नरदेवता सभी उसके आतंक से त्रस्त हो गये। सभी पीड़ित देवता इकट्ठे हो कर भगवान श्रीविष्णु की शरण में जा कर इस के उपाय की याचना करने लगे। विष्णुजी ने उन्हें यज्ञ करने के लिए कहा।यज्ञ कुण्ड की अग्नि से माँ दुर्गा अपने एक अंश कन्या के रूप में प्रगट हुयी।देवी ने प्रगट होने के पश्चात भगवान शंकर को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए समुद्र तट पर घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनसे विवाह करना स्वीकार कर लिया। देवताओं को चिन्ता हुयी कि यदि विवाह हुआ तो वरदान स्वरूप बाणासुर मरेगा नहीं। देवताओं की प्रार्थना पर देवर्षि नारद ने विवाह के लिए आते हुए भगवान शंकर को शुचीन्द्रम स्थान पर विवाह के  मुहूर्त टलने तक रोक लिया।भगवान शंकर वहीं स्थाणु रूप में स्थित हो गये। विवाह की समस्त सामग्री समुद्र में बहा दी गयी। कहते हैं कि वे ही रंग बिरंगी रेत के रूप में मिलते हैं।कथाओं के अनुसार, भगवान शिव और देवी कन्याकुमारी के बीच शादी नहीं हुई थी, इसलिए कन्याकुमारी ने कुंवारी रहने का फैसला किया। यह भी कहा जाता है कि शादी के लिए जो अनाज इकट्ठा किया गया था उसे बिना पकाए छोड़ दिया गया और वे पत्थरों में बदल गए और अभी भी पत्थरों के रूप में प्राप्त होते हैं।वर्तमान में उन पत्थरों को खरीद सकते हैं जो अनाज की तरह दिखते हैं जिन्हें प्रसाद के रूप में मानते हैं।देवी ने विवाह के लिए फिर तपस्या प्रारम्भ कर दी। बाणासुर ने देवी के सौन्दर्य की प्रशंसा सुन कर देवी के पास जाकर उनसे विवाह  करने का हठ करने लगा। वहां देवी से उसका भयंकर युद्ध हुआ। बाणासुर मारा गया। कन्याकुमारी वही तीर्थ है।यहां स्थित मन्दिर के दक्षिणी परम्परा के अनुसार चार द्वार थे। वर्तमान समय में तीन दरवाजे हैं। एक दरवाजा समुद्र की ओर खुलता था। उसे बंद कर दिया गया है। कहा जाता है कि कन्याकुमारी की नाक में हीरे की जो सींक है उसकी रोशनी इतनी तेज थी कि दूर से आने वाले नाविक यह समझ कर कि यह कोई दीपक जल रहा है तट के लिए इधर आते थे किंतु रास्ते में शिलाओं से टकराकर नावें टूट जाती थीं। इस कारण से मंदिर का पूर्वी द्वार बंद कर दिया गया है।मन्दिर के भीतर देवी कन्याकुमारी की भव्य मूर्ति प्रतिष्ठित है। दर्शन करते समय साक्षात् देवी के सम्मुख जैसा महसूस होता है।देवी कन्या कुमारी की आकर्षक मूर्ति की विशेषता देवी की हीरे की नथ है।इस नाक की नथ की चमक से संबंधित कई लोकप्रिय कहानियां प्रचलित हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, किंग कोबरा से नाक की नथ प्राप्त की गई थी। दर्शनार्थी मन्दिर में प्रवेश करने से पहले त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाते हैं जो मन्दिर के  बाईं ओर लगभग  500 मीटर की दूरी पर है।मन्दिर का तीनों समुद्रों के संगम स्थल पर बने होने के कारण यहां सागर की लहरों की आवाज स्वर्ग के संगीत की तरह सुनाई देती है। देवी के मूर्ति के एक हाथ में माला है एवं नाक और मुख के ऊपर बड़ेबड़े हीरे हैं। प्रातःकाल चार बजे देवी को स्नान कराकर चंदन का लेप चढ़ाया जाता है। तत्पश्चात् श्रृंगार किया जाता है। रात्रि की आरती बड़ी मनोहारी होती है। विशेष अवसरों पर देवी का श्रृंगार हीरेजवाहरात से किया जाता है। इनकी पूजाअर्चना केरल के नंबूदरी ब्राह्मण अपनी  विधि से करते हैं। निज द्वार के उत्तर और अग्र द्वार के बीच में भद्र काली जी का मन्दिर है। यह कुमारी देवी की सखी मानी जाती हैं।

पौराणिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि सती का पृष्ठ भाग यहां गिरा था। मुख्य मन्दिर के सामने पापविनाशनम् पुष्करिणी है। यह समुद्र तट पर ही एक ऐसी जगह है, जहां का जल मीठा है। इसे मंडूक तीर्थ के नाम से जाना जाता है। दर्शन के लिए कन्याकुमारी मन्दिर समय सुबह 4.30 बजे से दोपहर 12.30 बजे खुला रहता है। यह दोपहर में बंद हो जाता है और शाम को 4 बजे से रात 8 बजे तक खुलता है।

एक  अन्य पौराणिक कथा के अनुसार राक्षस बाणासुर को भगवान शंकर ने वरदान दिया था की उसकी मृत्यु सिर्फ़ कुँआरी कन्या के हाथों ही होंगी। उस समय भारत पर राज करने वाले राजा भरत को एक पुत्र और आठ पुत्रियाँ थी।

राजा भारत ने अपना राज्य को नौ हिस्सों में बराबर अपने संतानों में बाँट दिया। दक्षिण का हिस्सा पुत्री कुमारी को दिया गया। कुमारी को देवी पार्वती का अवतार माना जाता था। कुमारी ने दक्षिण भारत के हिस्से पर अच्छी तरह से शासन किया।

कुमारी भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी उसके लिए उन्होंने बहुत पूजा और तप किया।  भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर कुमारी से विवाह करने के लिए तैयार हो गए और विवाह की तैयारियां भी शुरू हो गयी।लेकिन होनी कुछ और थी।नारद मुनी को पता था कि राक्षस बाणासुर का वध कुमारी हाथों  ही हो सकता है और  इसके लिए उनका विवाह भगवान शंकर से नहीं होना चाहिए। आगे बताते हैं की कुछ समय बाद बाणासुर को कुमारी के सुन्दरता के बारे में पता चला और वो विवाह का प्रस्ताव लेकर देवी के  पास पहुँच गया लेकिन कुमारी ने शर्त रखी की अगर वो उन्हें युद्ध में हरा देगा तो वो बाणासुर के साथ विवाह कर लेंगी।  उस युद्ध में कुमारी के हाथों राक्षस बाणासुर का वध हो गया।

मंदिर के मुख्य देवता देवी कुमारी पूर्व की ओर मुख किए हुए हैं। मूर्ति देवी को माला के साथ एक युवा लड़की के रूप में दिखाती है। कन्याकुमारी मंदिर मजबूत पत्थर की दीवारों से घिरा हुआ है। मंदिर का मुख्य द्वार उत्तरी द्वार से होकर जाता है। मंदिर परिसर में भगवान सूर्यदेव, भगवान गणेश, भगवान अयप्पा स्वामी, देवी बालासुंदरी और देवी विजया सुंदरी को समर्पित विभिन्न मंदिर हैं। मन्दिर के अंदर  ही कुआं है जहाँ से देवी के अभिषेक के लिए जल का उपयोग किया जाता है। इसे मूला गंगा  तीर्थम के नाम से जाना जाता है।

कन्याकुमारी मन्दिर के पीछे की  अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, राक्षस बाणासुर ने सभी देवों को पकड़ लिया था और उन्हें अपनी कैद में रखा था। इसलिए, देवताओं के प्रार्थना और विनती करने पर, देवी पराशक्ति ने कुमारी कन्या का रूप धारण कर लिया, ताकि राक्षस का वध किया जा सके। समय के साथ, भगवान शिव को कुमारी से प्यार हो गया और उनकी आकाशीय शादी की व्यवस्था की गई।ऋषि नारद, जो इस तथ्य से अवगत थे कि राक्षस बाणासुर को तभी मारा जा सकता है जब देवी अविवाहित रहे, कई तरीकों से शादी को रद्द करने की कोशिश की गई। जब वह सफल नहीं हो सका और आधी रात के लिए शादी का समय तय किया गया।जिस दिन भगवान  शंकर ने विवाह के लिए अपनी यात्रा शुरू की  उसी समय शुचीन्द्रम में ऋषि नारद ने मुर्गा का रूप धारण  कर बाँग लगा दी। भगवान शंकर ने मुर्गे की आवाज सुनकर यह सोचा कि शादी का शुभ समय बीत चुका है और  लौट गये।जबकि देवी उनके इंतजार में ही रहीं ।बाद में देवी ने अविवाहित ही रहने का फैसला किया।परन्तु देवी की सुंदरता से मंत्रमुग्ध दानव बाणासुर ने उनसे ज़बरदस्ती शादी करने की कोशिश की तो उन्होंने उसे अपने चक्र गदा से उसका सर्वनाश कर दिया। बाद में बाणासुर ने देवी से दया  की भीख मांगी और पापों को करने की शपथ लिया। देवी ने उसे माफ करते हुए पवित्र संगम के पानी को  भी आशीर्वाद दिया कि जो भी यहां के पानी में डुबकी लगा लेगा वह सभी पापो से मुक्त हो जायेगा।

अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, ऋषि नारद और भगवान परशुराम ने देवी से कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर रहने का अनुरोध किया। भगवान परशुराम ने बाद में समुद्र के किनारे एक  मन्दिर का निर्माण किया और देवी कन्या कुमारी की मूर्ति स्थापित की।

वार्षिक उत्सवों के दौरान कन्याकुमारी मन्दिर का दौरा करना एक अलग अनुभव होता है। यहाँ वैसाखी महोत्सव मई के महीने में मनाया जाता है यह कन्याकुमारी मन्दिर का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। इसे 10 दिनों तक मनाया जाता है।इस त्योहार के दौरान, देवी कुमारी की मूर्ति भी त्योहार के विभिन्न जुलूसों में भाग लेती है।। चित्रा पूर्णिमा उत्सव, यह त्योहार उत्सव मई में पूर्णिमा के दिन होता है।कलाभम त्यौहार, यह त्योहार तमिल महीने (जुलाई और अगस्त के महीनों के बीच) में होता है।इसमें देवता को महीने के आख़िरी शुक्रवार को चंदन का लेप लगाया जाता है।नवरात्रि उत्सव, यह त्योहार 9 दिनों तक चलता है।विभिन्न संगीत कलाकार नवरात्रि मंडप में देवी देवता को अपना  भजन से प्रसन्न करते हैं।नवरात्रि में पूरे नौ दिन देवी की छवि की पूजा की जाती है और विजयादशमी के दिन बाणासुर का वध किया जाता है।इस कुमारी अम्मन मन्दिर में पूजा केरल के मन्दिरों की तरह तन्त्रसमुच्चयम के अनुसार की जाती है। भले ही मन्दिर तमिलनाडु में स्थित है, कन्याकुमारी कुमारी अम्मन मन्दिर को केरल का ही माना जाता है क्योंकि यह एक समय में त्रावणकोर राज्य का हिस्सा था।

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