:

बाढ़ की विभीषिका

top-news

बाढ़ एक जल निकाय है जो आमतौर पर सूखी जमीन पर कब्जा कर लेती है। बाढ़ व्यापक प्राकृतिक घटना है जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है। जब बादल फटता है, तो विभीषिका का अन्दाज़ लगाना मुश्किल होता है।भारी वर्षा होती है। इसके अलावा बर्फ का पिघलना भी बाढ़ लेकर आता है। जब किसी नदी, झील या समुद्र का पानी उसके आसपास की ज़मीन पर किनारे तोड़ कर फैलता है तो वही बाढ़ है। जब बारिश होती है, तो मिट्टी आमतौर पर पानी सोख लेती है लेकिन जब मिट्टी अधिक पानी नहीं सोख पाती है तो यह अतिरिक्त पानी को बाहर फैला देती है। पानी के साथ कभी-कभी ज़मीन की मिट्टी भी चली जाती है। 

बाढ़ का अर्थ है किसी भी नदी/नाले में पानी का अत्यधिक बहाव होना जिसके कारण पानी का नदी के किनारों से बाहर बहकर आसपास की ज़मीन को जलमग्न करता है। पहाड़ के शहरों में अत्यधिक बारिश के कारण आकस्मिक बाढ़ आती है। अचानक बाढ़ तब आती है जब भारी बारिश के कारण बहुत सारा पानी एक छोटी जगह में इकट्ठा हो जाता है और अत्यधिक दवाब बनने के कारण अचानक नीचे की तरफ़ तेज गति से उतरने लगता है। इसे ही फ्लैश फ्लड कहते हैं जिसका अनुमान नहीं होता है और अचानक बारिश या हिमनद में विस्फोट से नदियों का जल स्तर बढ़ जाता है।तटीय क्षेत्रों में तूफान और सूनामी भी बाढ़ का कारण बनते हैं।बाढ़-बारिश और भूस्खलन सभी दैवीय आपदा हैं, परन्तु आयी कैसे। इस पर गम्भीर विचार करने की आवश्यकता है। मानसून के दौरान देश का एक बड़ा हिस्सा पहले बाढ़ का कहर झेलता है और फिर बाढ़ के पानी के उतरने के पश्चात भिन्न-भिन्न बीमारियों से जूझता है। शनै: शनै: जब तक जन- जीवन पटरी पर आने लगता है तब तक एक और बाढ़ का समय आ चुका होता है। हिमाचल प्रदेश का बड़ा हिस्सा इधर कुछ वर्षों से लगातार बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है।दर्जनों घर, दुकान बह गये, गाड़ियां काग़ज़ की नाव की तरह उफनती बाढ़ में समा गयी।उफनती नदियों के भयंकर शोर से दिलों में खौफ पैदा हो जाता है।हज़ारों किलो वजनी पुल लहरों के आगे बेबस हो कर धराशायी और नदी के वेग में समाते चले गये। पशुओं की संख्या का तो पता ही नहीं कि कितने बह गये। सब बेबस एक दूसरे को देखते रह गये लोग काल के गाल में समाते गए जो बहुत क़िस्मत वाले थे उन्हें तिनके का सहारा मिला उन्होंने कैसे भी जान, लोगो के प्रयास से बचा लिया।
हिमाचल प्रदेश के चम्बा, कांगड़ा, कुल्लू, मनाली, मंडी में भारी बारिशसे अत्यधिक प्रभावित हुए। दूसरे दौर में ऊना, बिलासपुर, हमीरपुर, शिमला, सोलन, सिरमौर और लाहौल - स्पीति में तेज बारिश हुयी।हिमाचल में आसमानी आफत से हालात इतने खराब हो गये कि स्कूल-कॉलेज बंद हुए, हाइवे पर ट्रैफिक को रोक दिया गया और सभी को घरों में ही रहने की सलाह दी गयी। हिमाचल प्रदेश में कुछ वैसी ही हलचल दिखी जैसी 10 साल पहले यानी 16 जून 2013 को केदारनाथ त्रासदी के दौरान देखी गयी थी। पहाड़ों से उतरता काला मटमैला पानी रौद्र रूप अख्तियार करता हुआ रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले जाने पर आमादा दिखा। कुछ सेकंड्स में ही मकान-दुकान-शहर सब तबाह हो गये।वर्ष 2013 के बाबा केदारनाथ की त्रासदी में सैकड़ों की जान चली गई थी। हजारों घर और दुकानें तबाह हो गई थी। इतना ही नहीं कितने गांव और शहर तो पूरी तरह नक़्शे से ही ग़ायब हो गए थे। अब 10 साल बाद बाढ़-बारिश की विभीषिका वैसी ही मंज़र दिखा रही है।हिमाचल प्रदेश के स्फीति घाट में रेत खनन, किनारों को बर्बाद कर रहा है जिससे स्फीति नदी का प्रवाह प्रभावित हो रहा है, नतीजतन घाटी के खेतों में पानी भर जाता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मानसूनी हवाओं और पश्चिमी विक्षोभ की टक्कर से ऐसी खतरनाक स्थिति फिर उत्पन्न हुयी है। 

वर्ष 2013 में उत्तराखंड की बाढ़ के समय भी दो प्रणालीयों की टक्कर हुई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ों से हवाओं के टकराने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी आयी है गर्म हवाओं के टक्कर से ज्यादा बारिश और बाढ़ आने की आशंका बनी हुई है। हिमाचल प्रदेश के साथ-साथ उत्तराखंड के पहाड़ों में भी ऐसे ही हालात बन गये। पिछले कुछ दिनों से देश के उत्तरी भाग में दो मौसम प्रणाली सक्रिय हैं। राजस्थान से उत्तरी अरब सागर तक मॉनसूनी परिस्थितियां बनी। पश्चिमी विक्षोभ के साथ कम वायुमंडलीय दबाव का लम्बा क्षेत्र बना जिसके चलते बंगाल की खाड़ी से आ रही हवाएँ उत्तर दिशा की तरफ आगे बढ़ीं।इन हवाओं का केंद्र जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में बना तथा इन इलाकों को अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी मिली नतीजतन हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश हुयी। बाढ़ की समस्या अकेले भारत में नहीं है। इस बार तो यूरोप के कई देश, अमेरिका और चीन के शहर गुआंगजो, शेनज़न और टियांजिन भी बाढ़ग्रस्त हैं। गंभीर और लगातार बाढ़ का सामना करने वाले दुनिया भर के शहरों में एक्वाडोर, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, हो ची मिन्ह सिटी, वियतनाम, मियामी और न्यू ऑरलियन्स शामिल हैं।पहले भी इन क्षेत्रों में बाढ़ के कारण विनाश होते रहें हैं।यूरोप के जर्मनी, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, स्पेन आदि देशों में भी बारिश के पिछले सौ साल के सभी रिकार्ड टूट गए। यूरोप को इस बार बाढ़ के कारण लगभग 70 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। अमेरिका इन दिनों एक तरफ भीषण गर्मी तो दूसरी तरफ बाढ़ की चपेटे में है। दक्षिण-पश्चिम अमेरिकी राज्यों में इन दिनों भीषण गर्मी से लोगों का जीवन त्रस्त है, जबकि दक्षिण-पूर्वी राज्यों में भीषण चक्रवाती तूफ़ान के बारिश ने कहर ढा रखा है। चीन में बारिश ने पिछले एक हजार वर्षो का रिकार्ड तोड़ दिया है। चीन के डोंगझाऊ प्रांत में रिकार्ड 617 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुयी। इतनी बारिश केवल तीन दिन में हुयी।। यहाँ वर्ष भर में 640 मिलीमीटर बारिश साधारणतया होती है। ग़ैर प्राकृतिक गतिविधियों ने प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता को कई गुना बढ़ा दिया है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़े के अनुसार वर्ष 1950 में देश में केवल 371 बांध थे।अब इनकी संख्या पांच हजार के करीब है।नदियों पर बनने वाले बांध और तटबंध जल के प्राकृतिक बहाव में बाधा डालते हैं।अत्यधिक बारिश से नदियां उफान लेती हैं और तटबंध को तोड़ते हुए आस पास की बस्ती, शहरों, गाँवों को डुबो देती है।फ़सलों का नुक़सान होता है। विश्व बैंक ने कई बार कहा है कि नदियों पर बनने वाले बाँधों से फायदे की जगह नुकसान अधिक हो रहा है।
तकनीकी विकास के साथ-साथ मौसम विशेषज्ञों द्वारा प्राकृतिक आपदाओं की सटीक भविष्यवाणी करने की आवश्यकता है।अभी यह भविष्यवाणी केवल 50 से 60 % तक ही सही उतरती है। देश में इस प्राकृतिक आपदा से प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों में उत्तर बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल, मुंबई, महाराष्ट्र, पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों, तटीय आंध्र प्रदेश और उड़ीसा, ब्रह्मपुत्र घाटी और दक्षिण गुजरात सहित अधिकांश गंगा मैदान हैं। बाढ़ के कारण इन जगहों में पहले काफ़ी नुकसान हुआ है और अभी भी ये क्षेत्र ख़तरे का सामना कर रहे हैं।
वर्ष 2019 में किए गए एक अध्ययन से पता चला कि पिछले 60 वर्षों में, देश के कई क्षेत्रों में, खास तौर से मध्य में बारिश और बाढ़ की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। बारिश और बाढ़ आने वाले क्षेत्रों का विस्तार हुआ है।इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक एंड ओशनिक स्टडीज (CAOS) के अध्ययन से यह बात सामने आयी कि वर्ष 1980 के बाद अधिक बारिश होने की संभावनाएँ बढ़ गयी हैं। शहरी बाढ़, शहर का जल निकासी प्रणाली, नदी की बाढ़ या भारी बारिश के कारण आए पानी के प्रवाह को सम्भालने में अक्षम होने के कारण अधिकतर होते हैं। ज़्यादातर मामलों में, शहरी बाढ़ का कारण शहरों में जल निकासी की ख़राब व्यवस्था और निचले इलाकों जैसे झील के किनारे पर अतिक्रमण होता है।  

अगस्त 2020 में, महाराष्ट्र के पूर्वी विदर्भ क्षेत्र में बांध प्रबंधन की कमजोरी से क्षेत्र के कई जिलों में बाढ़ आयी और लगभग 90 हेक्टेयर खेती का नुकसान हुआ। किसान और खेतिहर मज़दूर बर्बाद हो रहे हैं।बेतरतीब तरीक़े से खुदाई के कारण कर्नाटक के कोडागु में भारी बारिश और भूस्खलन हुआ। खाई खोदना, रेल लाइनों, बिजली लाइनों और राजमार्गों जैसे गलियारों का विकास और रिसोर्ट इत्यादि का निर्माण भी बाढ़ आने के कारण बन रहे हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों में अन्धाधुन्ध तरीक़ों से ढाँचो का निर्माण, हरे-भरे स्थानों को नुकसान, आवासीय और कार्यालयी स्थानों के लिए झीलों और तालाबों का चयन, गाद और नालों का रखरखाव ठीक ढंग से न होना भी बाढ़ आने के कारण है। गोवा के राज मार्गो की त्रुटिपूर्ण डिज़ाइन ने स्थानीय जल निकास प्रणाली को बाधित कर दिया फलस्वरूप राज्य ने बाढ़ की विभीषिका झेला ख़राब तरीके से डिजाइन किए गए शहरी विस्तार की परियोजनाएँ, निचले इलाकों में आवासीय योजना, शहरी बाढ़ की समस्या को बढ़ाते हैं। शहरों के प्लान तो शहर के बसने के समय बनाए जाते हैं और उस के भविष्य की क्षमता को ध्यान में रख कर बनाये जाते हैं।जब भी कोई निकासी प्रणाली तैयार की जाती है तो  उपलब्ध नाले और नहरों की क्षमता को भी ध्यान में रखा जाता है। अगर आवश्यकता अधिक की होती है तो निकासी के नये प्रावधान भी तैयार किए जाते हैं।प्लान बनाते समय सुनिश्चित किया जाता है कि किस इलाके में पानी ज़्यादा जमा हो जाता है, कौन से निचले स्तर के इलाके हैं और उनके लिए पानी निकलने का मार्ग क्या होगा इत्यादि और उसी के आधार पर जल निकासी की व्यवस्था बनायी जाती है परन्तु प्रणाली के ऊपर क्षमता से ज़्यादा भार जनसंख्या विस्फोट के कारण पड़ने लगती है।।

 बहुत सारी अनाधिकृत और असुनियोजित बस्तियां बसने लगती हैं इससे नदी-नालों में जो पानी जाता है वो उस क्षमता से बहुत ज़्यादा होता है जिसके लिए वो तैयार किए जाते हैं।नदी- नहरों के आसपास के इलाके में बस्तियां बसने से नदी- नहरें संकरे हो रहे हैं।नियमानुसार नदियों-नालों के जलग्रहण क्षेत्र में किसी तरह की बसावट नहीं होनी चाहिए लेकिन ज्यादातर इन्हीं इलाकों में बसावट जल्दी हो जाती है।योजना बनाते समय पुराने उपलब्ध आँकड़ो से पता चल जाता है कि है पिछले पचास वर्षों में कितना पानी बाहरी स्त्रोतों से आया है और इसी इसी आधार पर जल निकासी की योजना बनाया जाता है परन्तु क्षमता से अधिक सवाब और जल निकासी के प्राकृतिक साधनों पर क़ब्ज़ा सभी प्लान धरे रह जाते हैं।ये समझना होगा कि नाले, नहरों में मिलते हैं , नहरें सहायक नदियों में मिलती हैं, सहायक नदियां नदी में मिलती हैं और नदी अन्त में समंदर से मिलती है।अर्थात् कही भी अवरोध हुआ तो पानी की निकासी रुकेगी और क्षेत्र जलमग्न होगा। दलदल, आर्द्रभूमि और झीलें बारिश के समय पानी को संग्रहित करने के लिए एक स्पंज की तरह काम करती है अतः विकासोन्मुखी परियोजनाओं को बनाते समय ऐसे स्थानों के साथ छेड़ छाड़ नहीं करनी चाहिए पर ऐसा हो नहीं पता है। बारिश के पानी की निकासी के लिए स्वच्छ, मुक्त बहने वाली नदियां और जलमार्ग को संरक्षित करना आवश्यक है। स्थान विशेष परिस्थिति को ध्यान मे रख कर इस तरह के प्रयास बचाव और आपदा राहत की तैयारियों के लिए अहम होते हैं।अगर शहर के पानी के निकासी प्रणाली को ठीक से लागू कर दिया जाए तो शहर में पानी जमा होने की समस्या 70 से 80 % तक ख़त्म हो जाएगी। बाढ़ प्रबंधन का विषय राज्यों के क्षेत्र के अधिकार में आता है। केन्द्र, राज्य के सरकारों को तकनीकी मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान करती है। राज्यों की आर्थिक स्थिति को देख कर ऐसा नहीं लगता है कि राज्य सरकार शहरों की पानी के निकासी की व्यवस्था को ठीक करने में सक्षम हो पाएगी ।सहयोग करने के लिये केन्द्र को भी आगे आना पड़ेगा। इनके अलावा नदियों की तलहटी में गाद इकट्ठा होना, वनों की अंधाधुंध कटाई देश-दुनिया में बाढ़ आने के कारणों में से एक है। हालांकि बारिश की घटनाएँ, बर्फ के पहाड़ों का पिघलना और तूफानों को बिलकुल रोकना मुश्किल है लेकिन अधिकांश मामलों में पहले से अगर सावधानी बरती जाये तो बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होने से पहले बचाव हो सकता है।वैसे तो कई कारण बाढ़ आने के हो सकते है परन्तु उनमें कुछ मुख्य का ज़िक्र यहाँ किया गया है: 

(क) बाढ़ की स्थिति ख़राब जल निकासी प्रणाली के कारण हो सकती है। कई बार थोड़ी अवधि की भारी बारिश से भी बाढ़ की स्थिति बन जाती है जबकि दूसरी तरफ कई दिनों तक चलने वाली हल्की बारिश भी बाढ़ जैसी स्थिति बना देती है।पूरे वर्ष सिंगापुर के अधिकांश हिस्सों में भारी वर्षा होती है पर वहां अच्छी जल निकासी प्रणाली है। भारी बारिश के दिनों में भी वहां समस्या नहीं होती। बाढ़ की समस्या और प्रभावित क्षेत्रों में होने वाली क्षति से बचने के लिए अच्छी जल निकासी व्यवस्था का निर्माण होना आवश्यक है 

(ख) ग्लेशियर जब पिघलने लगती है तो नदियों में पानी की मात्रा बढ़ जाती है। जल निकासी की उचित व्यवस्था होने से अगर नदियों का पानी शहर में आता है तो अच्छी पानी की निकासी की व्यवस्था होने से पानी अपने आप निकल जाता है और अगर ऐसा नहीं तो बाढ़ की सम्भावना बढ़ जाती है।

(ग) ऊंचाई पर पानी के बहाव को रोकने के लिए बांध बनाये जाते है।इन बाँधो की सहायता से पानी से बिजली बनाने के लिए प्रोपेल्लर्स लगाये जाते हैं। कई बार अधिक पानी आने के कारण पानी रोकने वाले गेट खोल दिये जाते हैं अन्यथा बाँध के टूटने का ख़तरा बन जाता है। जिसके फलस्वरूप आसपास के इलाकों में बाढ़ आ जाती है।

(घ) मजबूत हवाओं और तूफानों में समुद्र के पानी को सूखे तटीय इलाकों में ले जाने की क्षमता होती है जो बाढ़ का कारण बनता है। इससे तटीय क्षेत्रों में गंभीर क्षति होती है। तूफान और सुनामियों को तटीय भूमि में बड़ी तबाही का कारण माना जाता है।ज्वार के साथ भारी तूफान आने के कारण समुद्र का जल स्तर बढ़ जाता है इस से भी बाढ़ आने का ख़तरा पैदा हो जाता है।

(च) हाल के दिनों में तूफ़ानों के आने की संख्या बढ़ी है।वैज्ञानिकों का मत है 
कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते सतही समुद्री तापमान में काफी बढ़ोतरी हुई है और इससे कैरिबियन में उष्णकटिबंधीय तूफान की दर और कठोरता में वृद्धि हुई है। जो कई क्षेत्रों में बाढ़ का कारण हैं। कहा जाता है कि आने वाले समय में ध्रुवीय बर्फ पर फिर से बुरा प्रभाव पड़ेगा जिससे स्थिति और खराब होने की संभावना है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Prince Mahmud

Great Post

Prince Mahmud

Great Post

md shakil mia

Great Post

md shakil mia

Great Post